Bazeech-e-atfal hai duniya mere aage... (हिंदी में अनुवाद)

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उर्दु

Bazeech-e-atfal hai duniya mere aage...

Bazeecha-e-atfal hai duniya mere aage,
Hota hai shab-o-roz tamasha mere aage.
 
Hota hai nihan gard mein sehra mere hote
ghista hai zabeen khak pe dariya mere aage
 
Mat pooch ke kya haal hai mera tere peechhe
Too dekh ke kya rang hai tera mere aage
 
Bazeecha-e-atfal hai…..
 
Imaan mujhe roke hai, jo kheenche hai mujhe kufr
Kaba mere peechhe hai kalisa mere aage.
 
Bazeecha-e-atfal hai…….
 
Go hath ko jumbish nahin ankhon men to dum hai,
Rehne do abhi sagar-o-meena mere aage.
 
Bazeecha-e-atfal hai…
 
maheshksatijamaheshksatija द्वारा सोम, 07/11/2011 - 10:32 को जमा किया गया
आख़िरी बार रवि, 04/12/2016 - 21:09 को SaintMarkSaintMark द्वारा संपादित
हिंदी में अनुवादहिंदी
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मेरे सामने दुनिया एक बच्चे के खेल की तरह है……

मेरे सामने दुनिया एक बच्चे के खेल की तरह है
दिन और रात मैं इस दृश्य को देखता हूं
 
रेगिस्तान मेरी उपस्थिति में धूल में खुद को छुपाता है,
समुद्र मेरे सामने धूल में अपने माथे को रगड़ता है।
 
तुम मुझे छोड़ कर जा चुकी हो ,मत पूछो कि अब मेरा क्या हाल है
तुम अपना हाल देखो अब जब मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ
 
मेरे सामने दुनिया एक बच्चे के खेल की तरह है
दिन और रात मैं इस दृश्य को देखता हूं
 
मेरा अपना मज़हब मुझे रोकता है पर दूसरे मज़हब अपनी तरफ खींचते हैं
काबा मेरे पीछे है और मेरे सामने गिरजाघर है
 
मेरे सामने दुनिया एक बच्चे के खेल की तरह है
दिन और रात मैं इस दृश्य को देखता हूं
 
मेरे हाथों में हरकत नहीं रही , लेकिन कम से कम मेरी आंखों में तो ताकत है
अभी के लिए, मेरे सामने शराब और गिलास छोड़ दो
 
मेरे सामने दुनिया एक बच्चे के खेल की तरह है
दिन और रात मैं इस दृश्य को देखता हूं
 
Ramesh MehtaRamesh Mehta द्वारा गुरु, 09/08/2018 - 15:23 को जमा किया गया
आख़िरी बार रवि, 12/08/2018 - 14:59 को Ramesh MehtaRamesh Mehta द्वारा संपादित
लेखक के कमेन्ट:

ग़ालिब एक तुर्क परिवार से थे और उनके दादा मध्य एशिया के समरक़न्द से सन् १७५० के आसपास भारत आए थे। 11 साल की उम्र से ही मिर्ज़ा ने कविता लिखना शुरू कर दिया था. फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से प्राप्त की. गालिब की ग्रहण शक्ति बहुत तीव्र थी। वह फारसी कवियों का अध्ययन अपने आप करने लगे. बल्कि फारसी में गजलें भी लिखने लगें.
गालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक कशिश अंदाज पाया जाता है. जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है.
ग़ालिब को उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है
ग़ालिब की शायरी में एक रूहानियत है, एक मौलिकता है। उनकी पारदर्शी दृष्टि से कुछ अछूता नहीं रह सकता था। वह सभी धर्मों के लोगों से आराम से बात करने वाली बुद्धि रखते थे।
ज़िंदगी पर उनकी पकड़ बेमिसाल थी।
जब वह कहते हैं कि दुनिया उनके सामने एक बच्चों का खेल है और चमत्कारों से हमारी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आता तो लगता है कि वह चेतना के शिखर तक पहुंच चुके थे। उन्होंने भलीभांति हमारी उधार की ज़िंदगी को अपनी पारखी नज़र से भांप लिया था। जो ज़िंदगी सुबह शाम नीरस और उबाऊ हो उसे पहचानना क्या मुश्किल है। कुछ भी नया नहीं। सच में हमारी ज़िंदगी एक बच्चों का खेल है।
बिना जाने, बिना समझे, हम अपने अपने धरम का डंका बजा रहे हैं कि हमारा मज़हब ही सबसे ऊपर है.
ज्ञान तो केवल सच ही दे सकता है कोई और नहीं। दुनिया में इतने विचार हैं कि गिने नहीं जा सकते। हम कुछ विचारों को विशेष दर्जा देते हैं और अपना और लोगों को जीना दुश्वार कर देतें हैं। इस दुनिया के चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते क्योंकि हमारे दिल और दिमाग पर उधार की सोच पड़ी है। ग़ालिब कबीर की तरह एक राहस्वादी थे. कबीर का एक गीत कहता है -साधो यह मुर्दों का गांव

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