Ek Bas Tu Hi Nahin Mujhse Khafa Ho Baitha (हिंदी में अनुवाद)

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उर्दु

Ek Bas Tu Hi Nahin Mujhse Khafa Ho Baitha

Ek Bas Tu Hi Nahin Mujhase Kafa Ho Baitha
Mainne Jo Sang Taraasha Tha Kuda Ho Baitha
 
Uth Ke Manzil Hi Agar Aaye To Shaayad Kuchh Ho
Shauq-E-Manzil To Mera Aablaa-Pa Ho Baitha
 
Masalaht Chhin Li Quwwat-E-Guftaar Magar
Kuchh Na Kahana Hi Mera Meri Kata Ho Baitha
 
Shukriya Ai Mere Qaatil Ai Masiha Mere
Zahar Jo Tuune Diya Tha Wo Dawa Ho Baitha
 
Jaan-E-Shahazaad Ko Min-Jumlaa-E-Aada Pa Kar
Huuk Wo Utthi Ki Ji Tan Se Juda Ho Baitha
 
pedambutapedambuta द्वारा रवि, 02/05/2010 - 15:25 को जमा किया गया
आख़िरी बार मंगल, 02/06/2015 - 22:17 को Miley_LovatoMiley_Lovato द्वारा संपादित
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हिंदी में अनुवादहिंदी
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एक बस तू ही नहीं मुझसे ख़फ़ा हो बैठा

संस्करण: #1#2
एक बस तू ही नहीं मुझसे ख़फ़ा हो बैठा
(अकेले तुम ही नहीं जो मुझ से नाराज़ हो )
मैं ने जो संग तराशा वो ख़ुदा हो बैठा
(जिस पत्थर को गढ़ कर मैंने रूप दिया , वही भगवान बन बैठा )
 
उठ के मंज़िल ही अगर आये तो शायद कुछ हो
( लक्ष्य स्वयं ही मेरे निकट आए तो मेरा कुछ बन सकता है )
शौक़-ए-मंज़िल में मेरा आबलापा हो बैठा
( लक्ष्य तक पहुंचने की मेरी तीव्र इच्छा की वजह से मेरे पाओं में छाले पड़ चुके हैं )
 
मसलहत छीन गई क़ुव्वत-ए-गुफ़्तार मगर
(व्यवहार-कुशलता की दृष्टि से मैंने अपनी दलील देने की प्रतिभा को नहीं दिखाया }
कुछ न कहना ही मेरा मेरी सदा हो बैठा
(लेकिन मेरा चुप रहना ही मेरा वार्तालाप का ढंग समझा जाने लगा)
 
शुक्रिया ए मेरे क़ातिल ए मसीहा मेरे
(ऐ मेरे वधिक मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूँ कि तुम तो मेरे लिए मुक्तिदाता हो )
ज़हर जो तुमने दिया था वो दवा हो बैठा
(तुम्हारा दिया हुआ विष मेरे लिए औषधि का काम कर गया)
 
जाने 'शहज़ाद' को मिनजुम्ला-ए-आदा पाकर
(अपनी प्रतिभा का अनादर देख कर)
हूक वो उट्ठी के जी तन से जुदा हो बैठा
(कवि शहज़ाद को इतना दुःख हुआ कि उसकी आत्मा उसके शरीर से अलग हो गई)
 
Ramesh MehtaRamesh Mehta द्वारा गुरु, 06/09/2018 - 13:39 को जमा किया गया
लेखक के कमेन्ट:

ज़िंदगी हर आदमी अपने ढंग से जीता है। ज़िंदगी का कोई ऐसा पहलू नहीं जिस पर विचार नहीं किया गया। हर बात का चिंतन हुआ है.लेकिन फिर भी हम नये सिरे से अपना सर खपाते रहते हैं। दूसरों का ज्ञान , दूसरों के हथकंडे, दूसरों की सलाह, दूसरों के तज़रबे ,निष्कर्ष ,चालाकियां हमारे किसी काम नहीं आते। सब निरर्थक लगता है. हर आदमी को अपनी स्तिथि का अपने तरीके से ही सामना करना पड़ता है।
हम चाहे कितने प्रतिभावान क्यों न हों , हम चाहे किसी के प्रति कितने भी अच्छे क्यों न हों , यह ज़रूरी नहीं कि लोग हमें प्यार दें , हमारा सम्मान करें, हमारा दिल न तोड़ें।
हमारी हर कोशिश रहती है कि हमारा वर्चस्व स्थापित रहे लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। दुनिया अपने हिसाब से चलती है और हमारा संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। इसी संघर्ष से हमारी अपनी समझ पैदा होती है और वही हमारा मार्गदर्शक बनती है।

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