Mera Man Loche (हिंदी में अनुवाद)

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तिबत्ती

Mera Man Loche

Mera Man Lochai gur darshan taa-ee
Bilap karay chaatrik kee ni-aa-ee
Trikhaa na utarai shaant na aavai
Bin Darshan Sant pi-aaray jee-o
Hao gholee jee-o ghol ghumaa-ee
Gur darshan sant pi-aaray jee-o
 
Tayraa much suhaavaa jee-o sahaj dhun baanee
Chir ho-aa daykhay saaring paanee
Dhan so days jahaa too(n) vasi-aa
Mayray sajan meet muraaray jee-o
Hao gholee hao ghol ghumaa-ee
Gur sajan meet muraaray jee-o
 
Ik gharee na milatay taa kalijug hotaa
Hun kad milee-ai pri-a tudh bhagavantaa
Mo-eh rain na vihaavai need na aavai
Bin daykhay gur darbaaray jee-o
Hao gholee jee-o ghol ghumaa-ee
Tis sachay gur darbaaray jee-o
 
Bhaag ho-aa gur sant milaa-i-aa
Prabh abinaasee ghar meh paa-i-aa
Sayv karee pal chasaa na vichhuraa
Jan Naanak daas tumaaray jee-o
Hao gholee jee-o ghol ghumaa-ee
Jan Naanak daas tumaaray jee-o
 
Alexander ListengortAlexander Listengort द्वारा गुरु, 31/05/2018 - 16:23 को जमा किया गया
जमा करने वाले के कमेंट:

The original language is GURMUKHI

Mere Man Loche, also known as the Shabad Hazaaray, is a prayer of longing for the Beloved. It was written by Guru Arjan, the fifth Sikh Guru, when he was separated from Guru Ram Das, his father for a duration of time. During that period of separation he sent these three letters to his beloved Guru and father expressing his longing for the "blessed vision of the Guru". Reciting this prayer brings union with your beloved; it expresses in deep terms the true sense, the hurt of separation; the pain endured by the heart when the thought remains focused just on union and nothing else holds any meaning; when everything else loses any interest or meaning. It is an ultimate expression of love and longing for the Divine Beloved.

हिंदी में अनुवादहिंदी
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मेरा मनु लोचै

मेरा मन गुरु के धन्य दीदार के लिए बेताब है।
यह प्यासे चात्रिक की तरह रो रहा है।
मेरी प्यास बुझी नहीं है,
और मुझे प्रिय संत के धन्य दर्शन के बिना कोई शांति नहीं मिल सकती है।
मैं खुद को और अपनी आत्मा को
प्रिय संत गुरु के धन्य दीदार के लिए अर्पण करता हूँ ।
 
हे प्रभु तेरा चेहरा इतना सुंदर है और सुखदायी है , और तुम्हारे शब्दों की ध्वनि आत्मिक अडोलता प्रदान करती है
हे धनुर्धारी तेरा दीदार किये बहुत समय बीत गया है।
धन्य है कि वह भूमि (ह्रदय देश) जहां तेरा निवास है ,
हे मेरे मित्र और अंतरंग दिव्य गुरु। मैं बलिदान हूं,
मैं हमेशा अपने मित्र और अंतरंग दिव्य गुरु के लिए बलिदान हूं
 
हे मेरे प्यारे भगवान जब मैं तुम्हे एक पल के लिए भी नहीं मिल पाता तो लगता है कि कलियुग आ गया है
बताओ अब मैं प्रिय प्रभु तुम्हे कब मिल सकूँगा।
हे मेरे प्रिय भगवान, गुरु के दरबार का दर्शन किये बिना मेरी ज़िंदगी की रात आसानी से नहीं गुज़रती
मैं प्रिय गुरु के दरबार पर कुर्बान हूँ जो हमेशा अटल रहने वाला है
 
अच्छे भाग्य से, मैंने संत गुरु से मुलाकात कर ली है । मैंने अपने स्वयं के घर के भीतर अविनाशी भगवान को पा लिया है।अर्थात गुरू ने मुझे शांति का स्रोत परमात्मा मिला दिया है उस अविनाशी प्रभू को मैंने अपने हृदय में ढूंढ लिया है।
हे दास नानक! मैं तेरे दासों की सेवा करता रहूँ, मैं उनसे एक पल भर भी ना बिछड़ जाऊँ, एक रत्ती भर भी ना अलग होऊँ
हे दास नानक! मैं तेरे दासों से सदके हूँ, अर्पण हूँ।
 
Ramesh MehtaRamesh Mehta द्वारा शनि, 11/08/2018 - 18:59 को जमा किया गया
लेखक के कमेन्ट:

यह प्यारा शब्द सिख धर्म के पांचवे गुरु श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी का है। वे शिरोमणि, सर्वधर्म समभाव के प्रखर पैरोकार होने के साथ-साथ मानवीय आदर्शों को कायम रखने के लिए आत्म बलिदान करने वाले एक महान आत्मा थे.
गुरु जी की मानव जाति को सबसे बड़ी देन है श्री गुरुग्रंथ साहिब का संपादन। गुरुजी ने स्वयं की उच्चारित 30 रागों में 2,218 शबदों को भी श्री गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज किया है।
जाने अनजाने हम परमात्मा को तलाशते हैं , हर इन्सान ख़ुशी ढूंढ़ रहा है ख़ुशी मिलती है तो उसके न रहने पर वह गम में बदल जाती है। ख़ुशी को पाने के वह नए नए तरीके इस्तेमाल करता है पर फिर भी खुशी नहीं टिकती। भगवान को याद करता है। संतो के प्रवचन सुनता है। तीर्थ करने जाता है। लेकिन कुछ खास नहीं होता। स्वर्ग और नर्क की कहानियों में दिलचस्पी दिखाता है। विकारों में में भी पड़ता है। कुछ विशेष परिवर्तन नहीं घटता। वह ईश्वर को मानता है लेकिन स्वीकार नहीं करता। उसकी जिज्ञासा व व्याकुलता चरम पर नहीं पहुंचती। वह ईश्वर को खोजता ज़रूर है पर उसकी खोज इतनी प्रबल नहीं। उसकी खोज में सच्चाई नहीं।
हर इंसान के अंदर झूठ और सच का ज्ञान होता है।जब वह पाखंड से दूर रहता है और सच्चाई के खिलाफ कोई समझौता नहीं करता तो उसे सच्चाई के रास्ते पर चलने में ही आनंद आता है। उसका ध्यान सच्चाई पर ही केन्द्रित रहता है और कभी डांवांडोल नहीं होता और सच्चाई के बिना तड़पता है और फिर उसका अहम् मर जाता है और वह सचिआरा हो जाता है
ऐसा कहा जाता कि चात्रिक पक्षी अपनी प्यास केवल स्वाति नक्षत्र से गिरने वाली बूंदों से ही बूझाता है. वह मर जाएगा मगर किसी और पानी से अपनी प्यास नहीं मिटाता। अगर हम भी चात्रिक पक्षी की तरह अपनी प्यास भगवान के दर्शन के आलावा अन्य किसी से नहीं बुझाएंगे तो ही प्रभु में हम जी पाएंगे

Mirabai Ceiba: टॉप 3
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